उस रात जैसे समय ने खुद को धीरे-धीरे थाम लिया था।
मिथिला के उस आँगन में, जहाँ आम के पत्तों और गेंदे की झालरें हल्की हवा में हिल रही थीं, एक अजीब-सी खामोशी पसरी थी - जैसे कोई विदाई आने से पहले साँस रोककर खड़ा हो। औरतों के कंठ से उठते मधुर मैथिली गीत भी आज कुछ भारी लग रहे थे…
“बाबुल मोरा नैहर छूटल जाऽ…”
हर सुर में एक छुपा हुआ दर्द था।
वो मंडप में बैठी थी - लाल जोड़े में, माथ पर सजी पाग, आँखों में काजल… जो अब हल्का-हल्का धुंधला पड़ने लगा था। उसने नजरें झुका रखी थीं, पर वो झुकाव संकोच का नहीं था… वो अपने भीतर उठते सैलाब को छुपाने की कोशिश थी।
आँगन के एक कोने में उसकी माँ खड़ी थी।
बैठी नहीं।
थकी नहीं।
बस खड़ी थी…
जैसे हमेशा से खड़ी रही हो - हर मोड़ पर, हर ज़रूरत में, हर दुख-सुख में।
उसकी आँखें बार-बार झपकती नहीं थीं… जैसे डर हो कि कहीं एक पल की भी पलक झपकने से ये दृश्य छूट न जाए।
क्योंकि वो जानती थी-
ये आखिरी बार है…
जब उसकी बेटी इस घर में इस तरह बैठी है।
अपनी होकर।
रश्में चल रही थीं… पंडित की आवाज़, हवन की आंच, सब कुछ एक लय में था।
और फिर वो क्षण आया-
सिंदूर का।
दूल्हे का हाथ हल्का-सा काँपा।
शायद इसलिए नहीं कि उसे संदेह था…
बल्कि इसलिए कि उसे पहली बार एहसास हुआ -
ये सिर्फ एक रस्म नहीं है।
ये एक रेखा है…
जो दो दुनियाओं को अलग कर देती है-
पहले… और बाद में।
जैसे ही सिंदूर उसकी माँग में सजा-
एक हल्की-सी सरसराहट पूरे माहौल में दौड़ गई।
और उसी पल-
उसकी माँ टूट गई।
धीरे से।
खामोशी में।
बिना शोर किए।
उसके होंठ काँपे… आवाज़ निकलना चाहती थी, पर अटक गई। बस एक टूटी हुई साँस उसके सीने से निकली - जैसे दिल ने खुद को रोकना छोड़ दिया हो।
उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे…
पहले धीमे।
फिर तेज़।
फिर बेकाबू।
उसने चेहरा थोड़ा मोड़ा… छुपाने की कोशिश की।
पर माँ का दर्द कब छुपता है?
क्योंकि उस पल वो अपनी बेटी को दुल्हन नहीं देख रही थी…
वो देख रही थी-
एक नन्ही-सी बच्ची…
जो चलना सीखते-सीखते गिर जाती थी और उसकी गोद में आकर चिपक जाती थी।
वो बच्ची जो बिना उसका आँचल पकड़े सोती नहीं थी।
वो लड़की जो हर छोटी बात पर कहती थी-
“माँ, सुनू ने…”
“माँ, ई बना दियौ न…”
वो हर छोटी-छोटी याद…
जो अब एक साथ दिल में उमड़ आई थीं।
और अचानक -
उसे लगा…
ये दर्द…
उस दर्द से भी भारी है जो उसने उसे जन्म देते वक्त सहा था।
क्योंकि प्रसव का दर्द खत्म हो जाता है।
पर ये बिछड़ने का दर्द…
ये तो बस जीना सिखा देता है।
दुल्हन ने धीरे से आँखें उठाईं।
और उसने अपनी माँ को देखा।
बस एक नज़र में…
सब कुछ समझ लिया।
माँ के काँपते कंधे।
भीगे गाल।
वो बेबसी…
जो शब्दों में नहीं ढल सकती।
और उसी पल-
वो भी अंदर से टूट गई।
पर उसके होंठों पर मुस्कान थी।
एक नाज़ुक, काँपती हुई मुस्कान…
जो हिम्मत के धागों से सिली हुई थी।
क्योंकि बेटियों को सिखाया जाता है -
विदा होना…
खूबसूरती से।
चाहे दिल कितना भी क्यों न रो रहा हो।
उसकी उँगलियाँ साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ चुकी थीं…
जैसे खुद को संभालने की आखिरी कोशिश कर रही हों।
वो चाहती थी-
दौड़कर माँ से लिपट जाए…
कह दे-
“माँ, आज के लैल… हमरा नैऽ भेजू… हम तैयार नैऽ छी।”
पर वो चुप रही।
क्योंकि कभी-कभी प्यार…
रोकने में नहीं,
जाने देने में होता है।
दूल्हा ये सब देख रहा था।
चुपचाप।
उसकी आँखें भीग चुकी थीं…
पर वो बार-बार पलकें झपकाकर उन्हें छुपाने की कोशिश कर रहा था।
क्योंकि उसे लग रहा था-
वो किसी की दुनिया छीन रहा है।
वो आगे बढ़कर कुछ कहना चाहता था…
“मैं आपकी बेटी का ख्याल रखूँगा…”
पर शब्द बहुत छोटे लग रहे थे।
इतने बड़े दर्द के सामने-
वो बस खड़ा रहा…
एक जिम्मेदारी के साथ,
जो अब सिर्फ रिश्ते की नहीं…
भावनाओं की थी।
माँ धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
हर कदम भारी था…
जैसे जमीन उसे रोकना चाहती हो।
उसने अपनी बेटी का चेहरा थामा।
एक पल के लिए -
दुनिया रुक गई।
उसने उसका पल्लू ठीक किया…
वैसे ही,
जैसे हमेशा करती थी।
एक छोटी-सी आदत…
पर आज…
वो आखिरी स्पर्श लग रहा था।
फिर उसकी नजर सिंदूर पर गई।
वो लाल रेखा…
जो उसकी बेटी को उससे दूर ले जा रही थी।
और बस…
वो बिखर गई।
उसके आँसू उस सिंदूर पर गिर पड़े…
जैसे उसका प्यार वहाँ ठहर जाना चाहता हो।
उसने अपनी बेटी को गले लगा लिया।
ज़ोर से।
बहुत ज़ोर से।
जैसे वो उसे अपने भीतर वापस समेट लेना चाहती हो।
और उस आलिंगन में -
सालों की यादें समा गईं।
दुल्हन ने आँखें बंद कर लीं…
एक आँसू चुपचाप निकल गया।
क्योंकि कुछ दर्द…
आवाज़ नहीं माँगते।
बस एक पल माँगते हैं।
उस रात…
जब सब कुछ खत्म हो गया…
रोशनी बुझ गई…
आवाज़ें थम गईं…
एक कमरे में माँ अकेली बैठी थी।
उसका हाथ उस खाली तकिए पर था…
जहाँ उसकी बेटी सोया करती थी।
वो उसे सहला रही थी…
जैसे वो अब भी वहीं हो।
उसके होंठ काँपे…
और उसने धीरे से कहा -
“समय सऽ खाना खाऽ लैब…”
एक साधारण-सा वाक्य…
पर उसमें पूरा जीवन बसा था।
क्योंकि माँ…
अलविदा कहना नहीं जानती।
वो सिर्फ ख्याल रखना जानती है।
और उधर…
एक नए घर में,
नए रिश्तों के बीच,
एक दुल्हन चुप बैठी थी।
हाथों में मेहंदी…
माँग में सिंदूर…
पर दिल…
अब भी उसी आँगन में था।
अपनी माँ की गोद में।
और उसके पास बैठा वो आदमी-
उसे देख रहा था।
चुपचाप।
समझते हुए…
बिना कुछ पूछे।
क्योंकि उसने देख लिया था-
उस दर्द को।
और उसी खामोशी में-
उसने खुद से एक वादा किया-
वो उसे सिर्फ प्यार नहीं करेगा…
वो उस हिस्से को भी संभालेगा…
जो आज पीछे छूट गया है।
क्योंकि कुछ शादियाँ…
सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं होतीं-
वो दो दिलों के बिखरे हुए हिस्सों को
धीरे-धीरे…
प्यार से जोड़ने की शुरुआत होती हैं।
दुनिया हमेशा की तरह आगे बढ़ गई-
पर तीन दिलों में कुछ अनकहा ठहर गया।
एक माँ…
जिसने अपनी आत्मा का एक हिस्सा विदा कर दिया।
एक बेटी…
जो अपना पहला घर पीछे छोड़ आई।
और एक पुरुष…
जिसने अभी-अभी समझा था-
कि प्रेम केवल किसी को पाने का नाम नहीं है,
कभी-कभी यह उसके दर्द को विरासत में लेने का साहस भी होता है।
और उस रात की खामोशी में कहीं-
जब रोशनियाँ बुझ चुकी थीं,
आवाज़ें थम चुकी थीं-
एक माँ अकेली बैठी थी।
अपने पास की उस खाली जगह को सहलाते हुए…
जैसे अब भी वहाँ उसकी बेटी की मौजूदगी बाकी हो।
उसने धीमे से, लगभग फुसफुसाते हुए कहा-
“कभी लौट आना…
मेहमान बनकर नहीं,
मेरी छोटी-सी बेटी बनकर…”
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